भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जीवन परिचय – एक आज्ञाकारी और प्रतिबद्ध पुत्र जिसे माँ का गला काटना पड़ा
महर्षि जमदग्नि और रेणुका के पांच पुत्र थे जिनमें से एक परशुराम थे। उनके बचपन का नाम राम था। रेणुका राजा प्रसेनजीत की पुत्री थी जिन्होंने जमदग्नि से प्रेम विवाह करते हुए राजा का महल छोड़ कर ऋषि की कुटिया में रहने का निर्णय लिया था जहाँ राम (परशुराम) का जन्म हुआ।
विष्णु पुराण के अनुसार परशुराम ने अपनी शास्त्र शिक्षा भगवान शिव से कैलाश पर अपने माता पिता को सहस्त्रबाहु के अत्याचार से बचाने के लिए लिया था। सहस्त्रबाहु अर्थात जिसके पास सहस्त्र बाजुओं का बल हो। सहस्त्रबाहु एक राजा था जिसका नाम कार्तवीर्य था। उसे भगवान् मार्कण्डेय से वरदान स्वरुप सहस्त्र बाजुओं का बल मिला जिससे उसे सहस्त्रार्जुन नाम से जाना जाने लगा तथा सहस्त्र बाजुओं का बल होने के नाते जनता उसे सहस्त्रबाहु पुकारने लगी। सहस्त्र बाहु की राजधानी माहिष्मति (महिषपुर) मध्य प्रदेश में और कर्म क्षेत्र सहस्त्रार्जुनपुरी था। ऐसा माना जाता है कि उसका पराक्रम इतना अधिक था जिसने कालांतर में रावण जैसे राजा हो बंदी बना कर उसके राज्य का आधिपत्य भी ले लिया था। विष्णु पुराण के अनुसार हीं अपने 25 राज्यों के अधिग्रहण करने के बाद भी संतुष्टि नहीं मिलने पर उसने महत्वाकांक्षा की सारी सीमाएं लांघ दी और सभी राज्यों पर विजय पाने हेतु अपने मित्र राज्यों के राजाओं को अपने दरबार में अतिथि स्वरुप बुला कर धोखे से बंदी बना लिया था। बाद में कोई विद्रोह न कर पाए यह सोच के अनुसार सभी का वध भी कर दिया।

दूसरी ओर जब राम की शिक्षा दीक्षा पूरी होने के पश्चात् भगवान शिव ने नामकरण कर दिया जिसके बाद परशु धारण करने वाले राम, परशुराम नाम से विख्यात हुए। अपनी शिक्षा के उपरांत अपने प्रदेश लौटने की लालसा से जब वापस आ रहे थे, उसी काल खंड में सहस्त्रबाहु का उपद्रव अपने प्रदेश में काफी बढ़ गया था फलस्वरूप ऋषि जमदग्नि के सानिध्य में रहने वाले ऋषि और कुमार सभी काफी त्रस्त थे। इसकी मध्यस्तता के लिए जमदग्नि के आग्रह पर, सहस्त्रबाहु द्वारा माता रेणुका के आने पर हीं सुलह का प्रस्ताव मानने की बात कहते हुए सहस्त्रबाहु ने अपने चरित्र का प्रमाण भी दिया। सहस्त्रबाहु के आदेशानुसार ऋषि जमदग्नि के विरोध जताने पर भी राजा की पुत्री होने का वह जोश लिए रेणुका सहस्त्रबाहु के महल सुलह के लिए पहुँचती हैं। सहस्त्रबाहु के दुर्व्यवहार से क्षुब्ध होकर रेणुका उसे श्रापित करते हुए अपने कुटिया को लौट जाती हैं। पर लौटने में विलंब होने के कारण ऋषि कुंठित और क्रोधित होकर उनके चरित्र पर शंका करते हुए उन्हें त्यागने का निर्णय कर लेते हैं। फलस्वरूप उनके लौटने पर अपने दूसरे चार पुत्रों को यह बात बता कर माता के वध का आज्ञा भी देते हैं पर उनके पुत्र लोग माता की ममता और उन पर भी विश्वास का उदाहरण देते हुए उनकी आज्ञा मानने से इंकार कर देते हैं। फलस्वरूप ऋषि जमदग्नि अपनी कुटिया छोड़ कर वन को चले जाते हैं जहाँ परशुराम अपनी शिक्षा पाकर लौटते हुए जाते हैं। यह देख प्रसन्न होकर ऋषि जमदग्नि बिना पूरी बात बताये अपनी आज्ञा मनवाने का वचन परशुराम से ले लेते हैं। वापस घर लौटने के बाद वचनबद्ध परशुराम आज्ञाकारिता का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने पिता की आज्ञा से बिना कोई प्रश्न पूछे अपनी माता रेणुका का वध करने को विवश हो जाते हैं। यह सब दुखदायी क्षण था, पर पुत्र के आज्ञा मानने पर पारितोषित देने का निर्णय कर जमदग्नि पुत्र परशुराम से कुछ भी मांगने को कहते हैं। अंतत : परशुराम, माता रेणुका के वापस जीवनदान की मांग करने पर ऋषिवर जमदग्नि द्वारा उन्हें जीवित कर दिया जाता है।

कई सारे विभिन्न इतिहासकार कई कथाओं व् कहानियों में इसकी व्याख्यान विभिन्न तरीके से किये हैं। तत्पश्चात किसी कालखंड में सहस्त्रबाहु द्वारा कामधेनु गाय “सुशीला” की दिव्य शक्ति से परिचित होकर बलपूर्वक ऋषि जमदग्नि से हरण कर लेते हैं। जिससे क्रोधित होकर परशुराम सहस्त्रबाहु का वध कर उसे वापस ले आते हैं। इन सब घटनाओं से भी क्रोधित होकर सहस्त्रबाहु के चार पुत्र धोखे से ऋषि जमदग्नि की हत्या कर देते हैं। इसकी जानकारी मिलने के बाद भगवान परशुराम पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन करने का प्रण लेते हुए हैहय वंश के नाश का प्रयत्न बार-बार करते हैं। अंत में त्रेता युग में भगवान राम के जन्म के बाद हनुमान जी ने परशुराम से युद्ध कर मानव जाती के प्रति दायित्व का बोध कराया था उसके पश्चात् भगवान परशुराम क्षत्रियों के नाश का प्रण छोड़ पश्चाताप करने हेतु महेंद्र पर्वत पर चले जाते हैं।
ऐसा काव्यों में कहा गया है कि अपनी गुरु दक्षिणा पूर्ण रूप से शिव को न दे पाने तथा अपने प्रण को न पूरा कर पाने के कारण उनके प्रण स्वरुप निश्चित कार्यों के पूरा न कर पाने हेतु उनकी मृत्यु नहीं हुई तथा वो पृथ्वी पर सात चिरंजीवी में से एक हैं और विभिन्न रूप में पूजे जाते हैं। भगवान गणेश के एकदन्त नाम तथा उनको एक दन्त करने का श्रेय भी परशुराम को ही जाता है।