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मदर्स डे (मातृ दिवस) के आडंबर में क्या हम अपने पारिवारिक परंपरा के लिए गलत बीजारोपण कर रहे हैं !

हम पाश्चात्य सभ्यता की नक़ल करने और आधुनिकता की होड़ में दिन प्रति दिन अपने को एक निश्चित दिशा में धकेले जा रहे हैं। खुद को आधुनिक, विकसित और सामयिक दिखाने के दृष्टिकोण से किस राह पर भटके जा रहे हैं इसका अंदाजा भी नहीं है। आज हम मदर्स डे या मातृ दिवस बहुत ही उत्साह से मना रहे हैं और इसे और प्रकाशित और प्रसारित करने के लिए इसके लिए स्टेटस और रील्स भी बना रहे हैं। पर ये सब मनाने के पहले क्या हमने यह सोचा है कि हम ऐसी विचारधारा का बीजारोपण कर रहे हैं जो आगे जाकर क्या फल देगा। 

हमें निश्चित रूप से अपने माँ तथा पिता का आभार व्यक्त करना चाहिए। उनका स्नेह एवं ऋण सभी अतुलनीय है तथा हम जितना भी उनके लिए करें वह काम होगा।भारतीय शास्त्रों के अनुसार भी चार ऋण में से सर्वप्रथम ऋण माता पिता का ही होता है तथा गुरु स्वरूप में भी सर्वप्रथम स्थान माँ का आता है। हम उस संस्कृति को मानते हैं जहाँ मातृ देवो भवः एवं पितृ देवो भवः अर्थात माता पिता देवता के समतुल्य हैं ऐसा माना जाता है। 

पर क्या हम जो कर रहे हैं वो इसे सम्मान दे रहा है या अत्यधिक बौना बना रहा यह विचारणीय है। इसकी व्याख्या आगे जानेंगे पर सर्वप्रथम यह जानते हैं कि मातृ दिवस या वर्ल्ड मदर्स डे क्यों मनाते हैं और हम भारतीय या पारिवारिक परम्परा में जो भी अपने माता का सम्मान करते हैं उसे इसके प्रारूप का अनुसरण करना चाहिए या नहीं? प्राचीन भारतीय संस्कृति में संयुक्त परिवार की परम्परा रही है जो अब एकल परिवार में बदलता जा रहा है। हम अपने आस पास यह भी अनुभव कर पा रहे हैं कि अपने माता पिता को घर में छोड़ कर दूसरे घर में कई बच्चे या उनके परिवार रह रहे हैं और कई तो अपने माता पिता को वृद्ध आश्रम में ही छोड़ आ रहे हैं। यह सब हमारी मानसिकता को पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित होने देने का नतीजा है। यह मदर्स डे भी उसी मानसिकता को प्रोत्साहन देता है जिसमें आपकी माँ आपके साथ नहीं रहती या उनके बारे में आप नहीं जानते तो उनके लिए एक विशेष दिन पर उन्हें आप याद कर उन्हें सम्मान देते हैं या कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। 

क्या आपको पता है मातृ दिवस क्यों मनाते हैं? वास्तव में मातृ दिवस वेस्ट वर्जिनिया में एक महिला एना जार्विस द्वारा सभी माताओं और उनके मातृत्व को सम्मान देने के लिए प्रारम्भ किया गया था। इसके लिए विभिन्न उल्लेख विभिन्न जगह मिलते हैं। यूरोप या पश्चिमी देशों में भी कई युगल जोड़ी अपने बच्चे को अपने जीवन के लिए एक अवरोध के रूप में देखते हैं इसलिए उसके जन्म के उपरांत उसे किसी चर्च या चाइल्ड सेंटर पर जीवनयापन के लिए छोड़ देते हैं इसीलिए बच्चे अपने माता पिता के साथ नहीं रह पाते हैं, इसी कारण से चर्च में या कैथलिक व्यवस्था में फादर, सिस्टर एवं मदर का चलन है। यह किसी समुदाय विशेष पर टिप्पणी नहीं है यद्यपि यथार्थ है। इसी वंचित व्यवस्था में माता के अनुपस्थिति में उन्हें याद करने को उत्सव रूप देने के लिए किसी एक बच्चे ने अपनी माँ की याद में पुण्यतिथि पर सर्वप्रथम एक सभा एकत्रित किया था जिसमें आस पास की सभी माताओं को आमंत्रित किया बाद में जिसे मदर्स डे का नाम दिया गया। इस तरीके का अनुभव, जिसमें कई युवक, युवती या युगल माता पिता से वंचित रहते थे वह प्रचुर मात्रा में था। इसलिए उन देशों में यह प्रचलन बढ़ता गया और लोगों ने अपने माँ को साल में किसी एक दिन पर याद करने की परम्परा को मानने लगे। जिसे बाद में राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने पुरे अमेरिका में मदर्स डे के रूप में मनाने की घोषणा कर दी। 

एक और प्रचलन के अनुसार ब्रिटेन और यूरोपीय देशों में मई के दूसरे और चौथे रविवार को मदरिंग सन्डे के रूप में मनाते हैं, जिस दिन अपने माता पिता को याद करते हुए उन्हें अपने कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु रविवार को मिलने जाने का चलन व्यव्हार में है, जहाँ अपने माँ को स्नेह के लिए धन्यवाद के रूप में फूल, गुलदस्ता और उपहार देने का प्रचलन आरंभ हुआ। इसीलिए मई महीने के दूसरे रविवार को मदरिंग संडे मनाते थे जो मदर्स डे का का रूप ले लिया। इसके लिए कई अन्य तथ्य भी हैं, जैसे जापान में महारानी कोजुन के जन्मदिवस और थाईलैंड की रानी के जन्मदिवस को मदर्स डे के रूप में मनाया जाता है। 

पर हमारी प्राचीन संस्कृति और परम्परा में प्रतिदिन माता पिता का आशीर्वाद लेने की शिक्षा हमे पहले से मिली है। हम उन्हें देव तुल्य मानते हैं और गुरु के रूप में देखते हैं। महाभारत में भी यह उल्लेख है कि ‘गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमेको गुरुः’ अर्थात माता सभी गुरूओं में सर्वश्रेष्ठ गुरु मानी जाती है। इसलिए माता पिता और गुरु से प्रतिदिन आशीर्वाद लेने की परंपरा रही है। इसका वैज्ञानिक कारण भी है। पृथ्वी के चुम्बकीय व्यवहार या नॉर्थ पोल और साउथ पोल (उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव) के बारे में हमने सुना है जिसका  उपयोग कम्पास में भी दिशा निर्धारण के लिए करते हैं। उसी के अनुरूप शरीर को भी उसी नाभिकीय और चुम्बकीय संरचना के अनुसार सिर को उत्तरी तथा पैर को दक्षिणी ध्रुव माना जाता है। जिसमे ऊर्जा का प्रवाह उत्तरी ध्रुव (सिर) से दक्षिणी ध्रुव (पैर) की ओर होता है। इसलिए हमारे अभिभावक, माता पिता या गुरु के पैर छूने की परम्परा है। जिसके अंतर्गत उनके ऊर्जा, ज्ञान और अनुभव का संचार पैर के अंगूठे के माध्यम से छूने पर मिलता है। इन्ही कारणों से प्राचीन प्रथा में चरण स्पर्श की परम्परा रही है और हमें अपने माता पिता और गुरु का चरण स्पर्श प्रतिदिन करना चाहिए। हमने यह भी अनुभव किया है कि कई सन्यासी या तपस्वी अपना पैर छूने नहीं देते क्योंकि उन्होंने जितनी ऊर्जा और ज्ञान वर्षों में तपस्या से संग्रहीत किया है उसका संचार होने लगता है। प्राचीन परम्परा के अनुसार गुरु क्षण मात्र में किसी को अपना ज्ञान और ऊर्जा हस्तानांतरित कर सकते हैं। 

इसीलिए जिस प्रचुर ज्ञान और परम्परा का भंडार हमारी संस्कृति में रहा है हम उसे नक़ल करने में क्षीण कर रहे हैं। माँ का स्थान पूजनीय होता है और हम उनके स्नेह के लिए हर समय ऋणी है, तथा हमे कोई एक निश्चित दिन की आवश्यकता नहीं जिस दिन हम उनसे मिलने जाएं या उन्हें उपहार दे कर उनका आभार व्यक्त करें। इसलिए इस परम्परा में हम उनके अस्तित्व और उनके स्नेह को बौना करते हैं। उनका रोज सम्मान होना चाहिए, उनकी बात मानना, उनका आदर करना, उनका ध्यान रखना ही उनके प्रति आभार है। चार ऋण मातृ पितृ ऋण, देव ऋण, गुरु ऋण, सामाजिक ऋण में से सर्वप्रथम स्थान पितृ ऋण अर्थात माता पिता का ऋण ही है तथा इसी अवचेतना से प्रतिदिन उनका ध्यान और स्नेह मातृ ऋण को चुकाने के लिए जरूरी है। माता के स्थान को बताने के लिए रामायण में भी महर्षि वाल्मीकि ने इसके लिए दो बार व्याख्या किया है। पहला श्लोक में कहा गया है – 

मित्राणि धन धान्यानि प्रजानां सम्मतानिव ।

जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

अर्थात – “मित्र, धन्य, धान्य आदि का संसार में बहुत अधिक सम्मान है। परन्तु माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है।”

उसके बाद जब लक्ष्मण से लंका विजय के बाद श्रीराम चर्चा करते हैं – उस समय श्री राम कहते हैं-

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते ।

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ॥

अर्थात-  ” लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सोने की बनी है, फिर भी इसमें मेरी कोई रुचि नहीं है। क्योंकि जननी (माँ) और जन्मभूमि(मातृभूमि) स्वर्ग से भी ऊपर हैं। 

इसके बाद हमें खुद ही विचार करना होगा कि साल में एक दिन उस रूप में याद करें जिस रूप में यूरोपी, ब्रिटेन या अमेरिकी  लोग अपनी अज्ञात माँ को याद करते हैं या जो अपने से दूर रख कर साल में एक दिन उन्हें वो उपहार या स्नेह दिखा कर अपना आभार व्यक्त करते हैं? 

यह भी हमारे लिए विचारणीय है कि हम किस दिशा में अग्रसर होना चाहते हैं। अपने माँ को अपने साथ रखें प्रतिदिन स्नेह को, उनसे प्यार तथा उनका सम्मान कर वो आभार व्यक्त करें या उन्हें अपने से दूर कर दें और साल में एक दिन मदर्स डे मनाएं। यह विचार आज पनप चुकी है और हम अपने आस पास भी अनुभव करते हैं इसलिए यह सोचना निश्चित रूप से जरुरी है कि हम किस प्रथा का बीजारोपण कर रहे हैं और इसका आगे परिणाम या यूँ कहें तो फल क्या होगा। 

जबकि हमारा शास्त्र या हमारे पूर्वज अक्सर यह व्याख्या करते हैं कि 

नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः।

नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।।

अर्थात माता के समान कोई छाया नहीं है और न ही उनके समान कोई सहारा है। न तो दुनिया में मां के समान कोई रक्षक नहीं और उनके समान कोई प्रिय वस्तु भी नहीं है।

यह श्लोक जीवन में माता के महत्व को बताता है और हमे यह सोचने पर विवश करता है कि क्या यह मदर्स डे मनाने का प्रारूप सही रूप में उनके प्रति आभार या स्नेह को प्रगट कर रहा है या उनके स्नेह और समपर्ण को और बौना रूप में हम सभी के सामने प्रस्तुत कर रहा है। जहाँ हम मातृत्व को इतना उत्कृष्ट मानते हैं कि मातृभूमि, नदी, प्रकृति, जानवर तथा जननी को भी माँ स्वरुप देखते हैं।

नोट- यह किसी जाती, समुदाय या स्थान विशेष पर कोई टिपण्णी या ऊँचा नीचा दिखाने का प्रयास नहीं है यद्यपि माँ के वृहद् चरित्र को बौने रूप में परिवर्तिति होने से हुए आघात से मिली पीड़ा को शब्दों के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है।

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